Jai Chitra Gupt JI

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Global Kayasth Family -GKF

Sunday, November 11, 2012

ठाकरे के बहाने कायस्थों की कहानी


नवभारत टाइम्स | Sep 15, 2012, 04.00AM IST
संजय निरूपम
हाल ही में महाराष्ट्र के जानेमाने समाज सेवक और लेखक-पत्रकार प्रबोधनकार ठाकरे की आत्मकथा के एक पन्ने की कुछ पंक्तियों की चर्चा हुई, जिस पर राजनीतिक घमासान हो गया। प्रबोधनकार ठाकरे का मूल नाम केशव सीताराम ठाकरे है। वे शिवसेना के सर्वोच्च नेता बाला साहेब ठाकरे के पिता हैं। इन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उनका समाज मूलत: महाराष्ट्र का नहीं है और हजारों साल पहले मगध से आया है। वाया चित्तौड़गढ़ और भोपाल होते हुए। यह जानकारी उद्धृत की कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने। इनका उद्देश्य था यह साबित करना कि ठाकरे परिवार मूलत: अप्रवासी है और उस पर भी बिहारी।

जाहिर है इस पर बवाल होना था क्योंकि मुंबई में रहने वाले अप्रवासी बिहारियों को सदा निशाना बनाने वाले ठाकरे परिवार के लोग अगर मूलत: बिहार के हैं। और यह निष्कर्ष किसी साधारण शोधकर्ता के शोध में उपलब्ध नहीं है, बल्कि आज के उद्धव और राज ठाकरे के विद्वान दादा प्रबोधनकार ठाकरे के लेखन में उपलब्ध है, तो इसे नकारना मुश्किल है। उन्होंने कहा कि यह जानकारी उनके समाज के बारे में सही है, परिवार के बारे में नहीं। समाज और परिवार को कितना अलग किया जा सकता है, यह एक अनुत्तरित प्रश्न है।

दरअसल इस तर्क को काटने के लिए ठाकरे परिवार के पास कोई तथ्य नहीं है। इसलिए कुतर्कों का सहारा लिया जा रहा है। तो सच क्या है? ठाकरे परिवार की सामाजिक और जातिगत पृष्ठभूमि क्या है? उत्तर भारत में जो कायस्थ जाति है, उसे महाराष्ट्र में सीकेपी कहते हैं। अर्थात चंद्रसेनिम कायस्थ प्रभु। ठाकरे परिवार सीकेपी है। प्रबोधनकार ठाकरे ने अपनी आत्मकथा में इसी सीकेपी समाज के अनवरत विस्थापन की कथा सुनाई है। एक कथा के अनुसार चंद्रसेना नाम की एक महारानी थीं। जिन दिनों वह गर्भवती थीं, उनके पति की हत्या कर दी गई थी। कब, कहां और किसने, इस पर अलग-अलग मत हैं। पति की हत्या के बाद महारानी चंद्रसेना ने विस्थापन का सहारा लिया। उन्हीं के वंशज सीकेपी हैं। पुराणों में चंद्रसेना को देवी माना गया है।
रबोधनकार ने लिखा है कि उनका समाज राजा महापद्मनंद के जमाने में मगध में रहता था। यह दो हजार साल से ज्यादा पुरानी बात है। वह चंद्र गुप्त काल है। चंद्र गुप्त से पहले मगध पर नंद वंश का राज था। नंद वंश अत्याचारों और कुशासन के लिए कुख्यात था। तभी चाणक्य ने चंद्र गुप्त का सृजन किया था। प्रबोधनकार लिखते हैं कि नंद वंश के राजा के अत्याचारों से त्रस्त होकर उनका समाज मगध से विस्थापित हुआ था। फिर प्रकारांतर में चित्तौड़गढ़, भोपाल होते हुए महाराष्ट्र पहुंचा। हो सकता है महारानी चंद्रसेना पर हुए जुल्मों की कहानी प्रबोधनकार के इस शोध का आधार हो। सीकेपी महाराष्ट्र का एक शिक्षित, बुद्धिजीवी और सभ्य समाज माना जाता है। बड़े लेखक, पत्रकार और प्रशासक इस समाज ने दिए हैं। इसी समाज के जनरल अरुण कुमार वैद्य भी थे।

उत्तर भारत में अच्छी तादाद में पाए जाने वाले कायस्थ समाज और सीकेपी में काफी समानता है। दोनों समाज अपनी बुद्धिजीविता और प्रशासनिक कौशल के लिए जाना जाता है। इन्हीं कायस्थों की एक शाखा है सीकेपी। लेकिन कायस्थ जाति की मूल भूमि ऐतिहासिक तौर पर मगध प्रांत का वह क्षेत्र है, जो आज बिहार उत्तर प्रदेश के नाम से जाना जाता है। चाहे महाराष्ट्र हो या बंगाल या उड़ीसा या असम या राजस्थान-मध्य प्रदेश, यहां के कायस्थ मूलत: उत्तर भारत से रिश्ता रखते हैं। आज इनके उपनाम भिन्न हैं, पर उनकी फितरत समान है। कहते हैं, ब्रह्मा की काया से उत्पन्न हुए थे कायस्थ। इनके आराध्य देवता हैं चित्रगुप्त। पुराणों के अनुसार भगवान चित्रगुप्त स्वर्ग के मुनीम थे। वे मनुष्य जाति के पाप-पुण्य का हिसाब रखते थे। इनके वंशज भी परंपरा से हिसाब-किताब रखने का काम करते रहे हैं। पुराने जमाने के तमाम राजाओं के पास मुनीमगिरी करने के लिए जो वर्ग सर्वाधिक पसंदीदा था, वही कायस्थ समाज है। मगध काल में इसे पहली मान्यता मिली। फिर मुगलों के जमाने में और अंग्रेजों के शासनकाल में यह समाज विश्वसनीय प्रशासक बनकर उभरा। सम्राट अकबर के मंत्री टोडरमल इसी समाज के थे। इन्हें मुंशी जी कहा जाता था। साहित्य के शिखर पर आरूढ़ होने के बाद भी धनपत राय को मुंशी प्रेमचंद के नाम से जाना गया।

लिखने-पढ़ने, हिसाब-किताब और सभ्य व अनुशासित मगर नफासत की जिंदगी जीने के लिए मशहूर कायस्थ समाज ने देश को अनेक महापुरुष दिए हैं। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद प्रसाद, प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री, जयप्रकाश नारायण, सच्चिदानंद सिन्हा, हरिवंश राय बच्चन, महादेवी वर्मा इत्यादि। नेता जी सुभाष चंद बोस और ज्योति बसु बंगाल के कायस्थ थे। उड़ीसा के पटनायक मूलत: कायस्थ समाज के हैं। चाहे वे जेबी पटनायक हों या बीजू पटनायक।

आधुनिक कायस्थ समाज का मूल उद्भव स्थल क्या है? इस पर शोध हुआ है और अभी होना है। इस समाज की फितरत के दो पहलुओं को समझा जाए तो स्वयं स्पष्ट हो जाता है। एक तो यह समाज नौकरीपेशा है। दूसरा, इसकी घुमंतू प्रवृत्ति है। जैसे आज के अफसर सदा तबादले के शिकार होते रहे हैं, वैसे ही उस जमाने के कायस्थ या तो स्वयं एक राज्य से दूसरे राज्य में जाते थे या उन्हें भेजा जाता था। या वे पड़ोसी राज्यों द्वारा मंगवाए जाते थे। मगध के कायस्थ अपनी प्रशासनिक क्षमता के लिए कलिंगा बुलवाए गए होंगे, जो आज के पटनायक और नंदा के तौर पर जाने जाते है। प्रागैतिहासिक काल के बाद आधुनिक प्रशासन का पहला ऐतिहासिक दस्तावेज मगध काल में मिलता है। राजधानी पाटलिपुत्र थी, जो आज का पटना है। उस जमाने में नक्शे पर दिल्ली और मुंबई तो थी पर राष्ट्रीय महत्व पाटलिपुत्र का था। तमाम राष्ट्रीय घटनाओं का केंद व आकर्षण पटना था। वहां लोग काम की तलाश में जाते थे और वहीं से भारत की दूसरी रियासतों में जाते भी थे।

आज भी देशभर में अफसरों की कुल संख्या में सर्वाधिक कायस्थ ही हैं। और कायस्थों में भी बड़ी संख्या नौकरीपेशा लोगों की है। व्यवसाय या खेती कायस्थों की फितरत में बहुत कम ही रही है। इस समाज की हर दूसरी पीढ़ी अपने गांव या शहर को छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर सदा-सदा के लिए बस जाने के लिए विख्यात है। यही वजह है कि पाकिस्तान में भी कायस्थ पाए जाते हैं। धर्मांतरित मुस्लिमों में भी कायस्थों की एक अलग धारा है। दक्षिण भारत में भी नायर उपनाम के कायस्थ पाए जाते हैं। मगर शोध किया जाए तो सबके मूल में मगध का कनेक्शन मिलता है। मसलन मशहूर पत्रकार प्रीतीश नंदी बंगाली कायस्थ हैं, पर उनका मूल गांव भागलपुर है। जिन कायस्थों को बिहार या यूपी में मुंशी कहा जाता है, वे बंगाल में दासमुंशी के नाम से जाने गए।

Friday, November 9, 2012

इच्छा मृत्यु को भीष्म पितामह ने भी की थी चित्रगुप्त पूजा

कहते हैं कि श्रापग्रस्त राजा सुदास चित्रगुप्त पूजा के दिन ही भगवान चित्रगुप्त की पूजा कर स्वर्ग के भागीदार बने थे। महाभारत काल में भीष्म पितामह भी भगवान चित्रगुप्त की पूजा के उपरांत उनसे इच्छा मृत्यु का वर प्राप्त किए थे।

सभी मनोकामना पूर्ण होगी

श्रीचित्रगुप्त भगवान की पूजा-अर्चना करने के लिए पहले श्रद्धालु स्नान आदि कर लें। नया वस्त्र धारण कर भगवान चित्रगुप्त की प्रतिमा आसन पर विराजमान कर दे। रोली चंदन केशर, धूप, फूल, कुमकुम, इत्र के साथ चित्रगुप्त की पूजा करें।
श्रद्धालु भक्त इस मंत्र-
ऊं चित्रावसो स्वस्ति ते पारमशीय!
धर्मराज सभा संस्थकृत विवेकिनम्!!
आवाहे चित्रगुप्त लेखनी पत्र हस्तकम!
ऊं भू भूर्व स्व चित्रगुप्ताय नम: !!
से पूजा करने से सभी मनोकामना पूर्ण होगी।

पूजा से पापों से मिलती है मुक्ति

ब्रह्मा जी ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा कि जो मनुष्य तुम्हारी पूजा करेगा इसकी सभी पापों से मुक्ति मिल जाएगी। वह पृथ्वी पर आनंद से जीवन यापन करेगा। तभी से भगवान चित्रगुप्त की पूजा पृथ्वी लेक पर होने लगी। खासकर कायस्थ जाति के ये कुलदेवता भी है।

लेखनी कटनी हस्ते, चित्रगुप्त नमस्तुते

 
 मान्यता के अनुसार धर्मराज को धर्म प्रधान बनाकर सबके पितामह ब्रह्मा ने उन्हें अकर्मण्यता त्यागने को कहा। ब्रह्मा के आज्ञानुसार धर्मराज ने निवेदन किया व कहा कि कर्मो के लेखा-जोखा का कार्य सरल नहीं है। जीवों में देशकाल व उनके कर्म अनंत हैं। इसलिए ऐसा सहायक मित्र प्रधान करें जो नितांत धार्मिक, न्यायिक, ब्रह्मानिष्ठ व वेदशास्त्र का ज्ञाता हो। तब ब्रह्मा ने धर्मराज की बात स्वीकार कर घोर तपस्या की। जब नेत्र खोला तो अपने सामने श्याम रंग, कमल नयन व चन्द्रमा के समान मुख वाले को पाया। जिनके हाथ में कलम दवात थी। तभी से चित्रगुप्त पूजा मनाई जाती है।

यहां कलम-दवात और कागज चढ़ाने से बदलता है भाग्य!









भोपाल। कहा जाता है कि भाग्य तो जन्म के साथ ही लिख जाता है, मगर एक स्थान ऐसा है जहां कागज, कलम और दवात चढ़ाने से भाग्य बदलकर नए सिरे से लिख जाता है। यह स्थान मध्य प्रदेश में महाकाल की नगरी उज्जैन में है, जहां भगवान चित्रगुप्त और धर्मराज एक साथ मिलकर आशीर्वाद देते हैं।

उज्जैन नगरी के यमुना तलाई के किनारे एक मंदिर में चित्रगुप्त एवं धर्मराज एक साथ विराजे हैं। यह स्थान किसी तीर्थ से कम नहीं है। मान्यता है कि इस मंदिर में कलम, दवात व डायरी चढ़ाने मात्र से मनोकामना पूरी हो जाती है। यही कारण है कि इस मंदिर में दर्शन करने आने वाले श्रद्घालुओं के हाथों में फल-फूल न होकर कलम, स्याही और डायरी नजर आती है।

चित्रगुप्त और धर्मराज की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग कथाएं है। भगवान चित्रगुप्त के बारे में कहा जाता है कि इनकी उत्पत्ति स्वयं ब्रह्मा जी के हजारों साल के तप से हुई है। बात उस समय की है जब महाप्रलय के बाद सृष्टि की उत्पत्ति होने पर धर्मराज ने ब्रह्मा से कहा कि इतनी बड़ी सृष्टि का भार मैं संभाल नहीं सकता।

ब्रह्मा जी ने इस समस्या के निवारण के लिए कई हजार वर्षो तक तपस्या की और उसके फलस्वरूप ब्रह्मा जी के सामने एक हाथ में पुस्तक तथा दूसरे हाथ में कलम लिए दिव्य पुरुष प्रकट हुआ। जिनका नाम ब्रह्मा जी ने चित्रगुप्त रखा।

ब्रह्मा जी ने चित्रगुप्त से कहा कि आपकी उत्पत्ति मनुष्य कल्याण और मनुष्य के कर्मो का लेखा जोखा रखने के लिए हुई है अत: मृत्युलोक के प्राणियों के कर्मो का लेखा जोखा रखने और पाप-पुण्य का निर्णय करने के लिए आपको बहुत शक्ति की आवश्यकता पड़ेगी, इसलिए आप महाकाल की नगरी उज्जैन में जाकर तपस्या करें और मानव कल्याण के लिए शक्तियां अर्जित करे।

कहा जाता है कि ब्रह्मा जी के आदेश पर चित्रगुप्त महाराज ने उज्जैन में हजारों साल तक तपस्या कर मानव कल्याण के लिए सिद्घियां एव शक्तियां प्राप्त की। भगवान चित्रगुप्त की उपासना से सुख-शांति और समृद्घि प्राप्त होती है और मनुष्य का भाग्य उज्जवल हो जाता है। इनकी विशेष पूजा कार्तिक शुक्ल तथा चैत्र कृष्ण पक्ष की द्वितीया को की जाती है।

भगवान चित्रगुप्त के पूजन में कलम और दवात का बहुत महत्व है। उज्जैन को भगवान चित्रगुप्त की तप स्थली के रूप में जाना जाता है। धर्मराज के बारे में पौराणिक कथाओं में वर्णित है कि वह दीपावली के बाद आने वाली भाई दूज पर यहां अपनी बहन यमुना से राखी बंधाने आए थे तभी से वह इस स्थान पर विराजित हैं। कहा जाता है कि धर्मराज द्वारा यहां पर अपनी बहन से दूज के दिन राखी बंधवाने के बाद से भाई दूज मनाया जा रहा है। आज भी यहां पर धर्मराज और चित्रगुप्त मंदिर के सामने यमुना सागर स्थित है। श्रद्घालुओं को इनके दर्शन व पूजन करने से मोक्ष मिलता है।

चित्रगुप्त जी के ठीक सामने चारभुजाधारी धर्मराज जी एक हाथ में अमृत कलश दो हाथों में शस्त्र एवं एक हाथ आशीर्वाद की मुद्रा के साथ विराजित है। धर्मराज की मूर्ति के दोनों ओर मनुष्यों को अपने कमोर्ं की सजा देते यमराज के दूत हैं। इतना ही नहीं ब्रम्हा, विष्णु महेश की भी प्रतिमाएं हैं।

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